जाले विधान सभा क्षेत्र की जमीनी हकीकत

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फिर जान बुझ कर अपनी मौत का सामान कर रही है कांग्रेस

मीम ज़ाद फ़ज़ली

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बिहार विधानसभा का आगामी चुनाव जिस की शुरुआत 28 अक्टूबर 2020 से हो रही है। यह चुनाव तीन चरणों में करने का फैसला किया गया है ,जिस के अनुसार दूसरा चरण 3 नवम्बर त्था अंतिम चरण 7 नवंबर 2020 को होना है और दस नवबंबर को नतीजा सुनाया जाएगा। अब प्रश्न यह उठता है की यह समय किसकी दूरदर्षिता और राजनीतीक परिपक्वता को आजमाने का है ?
यह समय उमीदवार से ज्यादा सभी पार्टियों और गठबंधनों के वरिष्ठों, ओहदेदारों और आला कमानों की दूरगामी नजरों को परखने और पहचानने का है, यहीं से इस आशंका को भी बल दिया जा सकता है या निर्बल किया जासकता है की कौन सी पार्टी टिकट बंटवारे के नाम पर धन उगाही का करोबार कर रही है। और कौन पार्टी ईमानदारी से क्षेत्र की जनता और आवश्यकता और विकास को ध्यान में रख कर जिताऊ उम्मीदवारों को मैदान में उतारती है। उक्त सवालों का उत्तर इन चंद लाइनों में तलाशा जाएगा।

ڈاکٹر میم ضاد فضلی
Meem Zaad Fazli

अब समय भी नहीं बचा है कि हम पूरे राज्य का सर्वेक्षण प्रस्तुत कर सकें। लिहाजा राज्य को छोड़ दिजिए एक जिला के सभी पक्षों के उम्मीदवारों का विश्लेषण कर के सन्दर्भों के साथ आप के सामने प्रस्तुत किया जा सके इस अलप समय में यह भी असंभव सा लग रहा है। इस लिए मैं दरभंगा जिला के मात्र एक विधान सभा सीट जाले में दिए गए उम्मीदवारों के विषय में ही दो चार जरुरी बातें रखना चाहूंगा। यहाँ राजग ने जिबेष मिश्रा को पुनः अपना उम्मीदवार बनाया है जो किसी भी जीती हुई पार्टी के लिए कायद्यानुसार सही भी है। जिबेष इस से पहले भाजपा के टिकट पर 2015 में जीत चुके हैं उन्हों ने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी ऋषि मिश्रा को पछाड़ कर विजयी पताका लहराया था। उक्त चुनाव में भाजपा के जीबेश मिश्रा को 41.69 प्रतिशत जबकि दूसरे स्थान पर रहने वाले ऋषि मिश्रा का वोट प्रतिशत भी कोई ख़राब नहीं रहा था। उन्हों ने 38.59 पतिशत मत प्राप्त किया था। दूसरी ओर साइकल पर सवार मुजीबुल रहमान ने अपने अकूत धन के बल पर 4.54 प्रतिशत मत काटा था, वह महा गठबंधन से टिकट के उमीदवार थे, वह दिल्ली से जाकर जाले में विजय का परचम लहराना चाहते थे, मगर गठबंधन के दूरंदेश जमीनी वास्तविकता से भली भांति वाकिफ नेताओं और टिकट देने वाले समझदार समूहों ने उस उमीदवार पर ही भरोसा किया जो पहले से ही क्षेत्र में अपने कार्यकुशलता और सद्भाव से खास पहचान बना चुके थे। इस लिए ऋषि मिश्रा पर ही भरोसा किया गया और वह तीर छाप पर मैदान में उतरे, किन्तु सिर्फ टिकट न मिलने की खीज निकालने के लिए मुजिबुल रहमान ऐसी पार्टी से सिम्बल ले आये जिसे क्षेत्र की जनता जानती तक न थी। यानि अखिलेश यादव की पार्टी सपा के चिन्ह पर मैदान में उतरे और दस बारह गाँव के गिने चुने छूट भइयों, ग्रामीण क्षेत्र की जनता को मुख्या और ब्लॉक तंत्र से मिल कर मूरख बनाने वाले चौधरियों को लाख दो लाख थमा कर इतना काम जरूर कर लिया की वह सवयं जीतें या न जीतें मगर सेक्युलर गठबंधन की पीठ में अच्छी तरह से छुड़ा घोंप कर उन्हें परास्त जरूर करवा दें। क्षेत्र में तो इस पर भी गपशप और चर्चाएं सुनने को मिलीं कि दर असल इस गन्दा खेल और आम जनों के अरमानों पर पानी फेरने के लिए भाजपा ने धन बल देकर मुजीबुल रहमान को अपने उद्देश्य में सफल होने के लिए उतारा था। बहरहाल सेकुलर उमीदवार के रहते और उन के पहले के विकास कार्य सामने दिखाई देने के और उनकी प्रबल अपेक्षा के बावजूद महज 4.54 वोट कट जाने के कारण भाजपा को उम्मीद के बरखिलाफ जीत मिल गई और मुजीबुल रहमान को मैदान में उतारने की भाजपा की राजनीती सफल होगयी।
सुनने में आया है की अतीत से सबक न लेते हुवे कांग्रेस अपनी आदत के मुताबिक़ रात के सन्नाटे में कार्य योजना बना कर अपने लिए फिर जाले विधानसभा में मौत का कुवां खोद रही है। जाले विरान सभा से एक ऐसे प्रतिनिधि का टिकट काट रही है जिस की क्षेत्र में अच्छी खासी पहचान है, ऋषि मिश्रा की अपेक्षाकृत यह उस्मानी कौन है जिसे उसके पिछवाड़े के लोग भी नहीं जानते, जो जाले की जमीनी परिस्तिथि से भी भली भांति अवगत नहीं है, जिसे हमारे क्षेत्र के सभी 26 पंचायत के नाम तक मालूम नहीं हो सकते, उसे जनता वोट करेगी या महा गठबंधन की कब्र खोदेगी इसका अंदाजा मदन मोहन झा जी आपको होगा। आप खुद भी दरभंगा से हैं, मैं भी उसी जमीन से हूँ। आपका राजनीतिक अनुभव भी काफी व्यापक है , आप ही बताएं क्या कोई भी उम्मीदवार क्षेत्र में दोचार बरस समाज की सेवा किये बिना अपनी पहचान बना सकता है, क्या राहुल गाँधी को मालूम नहीं के उनके जी हजूरी वाली आदत के कारन ही ऐसे ही एक उमीदवार को 2010 में जाले विधानसभा से टिकट दे कर अपनी जमानत जब्त करा चुकी है, उस समय तो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मौजूदा एम एल सी प्रेम चंद्र मिश्रा जी ने डा. शकील पर आरोप लगाया था के टिकट बंटवारे में लालू यादव को फायदा पहुँचाने के लिए उन्हों ने ऐसे कैंडिडेट्स को टिकट दिया था जो उनके आगे पीछे घूमने वाले, उन का झंडा ढोने वाले या उन के सगे संबंधी थे। उन की बातें सत प्रतिशत निराधार भी नहीं थीं। चलिए मान लिया जाये कि उस समय डा. शकील ने कुछ सीटों पर ऐसा किया भी हो, यह भी मान लेते हैं कि उन्हों ने कुछ टिकट बेचे भी हों. मगर अंधे कुँवें में भटकने वाली कांग्रेस आज किस के इशारे पर नाच रही है ,जब उस की दूर दर्शीता सीट बंटवारे में फिसड्डी दिखाई पड़ रही है तो वह चुनाव को अपने पक्ष में कैसे कर पाएगी।
एक पत्रकार होने और जाले विधान सभा का परिचित और अनुभवी नागरिक होने के नाते मैं दावे से कह सकता हूँ की पैराशूट और अनुभवहीन व्यक्ति को कांग्रेस यदि टिकट देती है तो वह जाले को फिर भूल जाये और मैं तो अपने क्षेत्र की जनता आने वाली तबाही से वाकिफ कराने के लिए आऊंगा ही, कि अपने क्षेत्र की जनता को सजग करना और उनके अच्छे बुरे के विषय में सोचना मेरा परम् धर्म है।
धन्यवाद
मीम ज़ाद फ़ज़ली
संपादक : नया सवेरा

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